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तेल खरीद में भारत का गाइडिंग फैक्टर क्या है? US ट्रेड डील पर विदेश सचिव विक्रम मिसरी का पहला रिएक्शन
India Oil Policy: क्या भारत किसी दबाव में अपना तेल फैसला बदल रहा है? US ट्रेड डील, रूसी तेल और वेनेजुएला एंट्री के बीच विदेश सचिव विक्रम मिसरी का बयान कई सवाल खड़े करता है। क्या कीमत, सप्लाई और राष्ट्रीय हित ही भारत का असली गाइडिंग फैक्टर हैं?

Indian Energy Security: जब अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड डील को लेकर चर्चाएं तेज़ हुईं और यह दावा सामने आया कि भारत रूसी तेल खरीदना बंद कर देगा, तब देश में एक बड़ा सवाल उठा—आखिर भारत तेल खरीदते समय किस बात को सबसे ज़्यादा अहमियत देता है? इसी सवाल का जवाब विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने बेहद साफ और सीधे शब्दों में दिया।
क्या भारत अमेरिका के दबाव में अपने तेल फैसले बदल देगा?
विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने साफ कहा कि भारत की एनर्जी पॉलिसी किसी एक देश के दबाव से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित (National Interest) से तय होती है। उन्होंने ज़ोर देकर बताया कि भारत एक बड़ा एनर्जी कंज्यूमर है और अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए कई देशों से कच्चा तेल आयात करता है। उनके मुताबिक, भारत के लिए तेल खरीदने में तीन बातें सबसे ज़्यादा मायने रखती हैं-तेल की उपलब्धता, सही कीमत और सप्लाई का भरोसा। यही तीनों फैक्टर भारत की तेल खरीद नीति की रीढ़ हैं।
#WATCH | Foreign Secretary Vikram Misri says, "...Our foremost priority is to safeguard the interests of Indian consumers insofar as energy is concerned—to really ensure that they receive adequate energy at the right price and through reliable and secure supplies. And our import… pic.twitter.com/2ydWV1b25z
— ANI (@ANI) February 9, 2026
क्या रूस से तेल खरीदना बंद करेगा भारत?
US राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे के बाद कि भारत ने रूसी तेल न खरीदने पर सहमति जताई है, इस मुद्दे पर भ्रम की स्थिति बन गई थी। लेकिन मिसरी के बयान से यह साफ हो गया कि भारत रूस से अपने ऊर्जा संबंध अचानक खत्म करने वाला नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत न तो किसी एक सप्लायर पर निर्भर है और न ही भविष्य में ऐसा करने का इरादा रखता है। बाजार की स्थिति के हिसाब से अलग-अलग देशों से तेल खरीदना भारत की रणनीति का हिस्सा है।
वेनेजुएला के तेल को लेकर भारत का रुख क्या है?
क्या भारत रूस के अलावा नए विकल्प तलाश रहा है? जवाब है-हां। भारत वेनेजुएला जैसे देशों से भी तेल आयात की संभावनाएं तलाश रहा है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, अगर कोई विकल्प कमर्शियल रूप से फायदेमंद और एनर्जी सिक्योरिटी के अनुकूल होता है, तो भारत उस पर विचार जरूर करेगा। यह कदम भारत की उस नीति से जुड़ा है, जिसमें वह अपनी सप्लाई चेन को मजबूत करने के लिए तेल स्रोतों का डायवर्सिफिकेशन करता है।
रूस भारत के इस फैसले को कैसे देखता है?
रूस ने भी साफ कहा है कि भारत पूरी तरह आज़ाद है कि वह किस देश से तेल खरीदे। क्रेमलिन के अनुसार, भारत का अलग-अलग स्रोतों से तेल लेना कोई नई बात नहीं है और यह फैसला हमेशा मार्केट कंडीशन और नेशनल इंटरेस्ट पर आधारित रहा है।
US टैरिफ का भारत पर क्या असर पड़ा?
US द्वारा लगाए गए 25 प्रतिशत टैरिफ ने भारतीय रिफाइनरी कंपनियों की लागत बढ़ाई है। इसके बावजूद भारत की प्राथमिकता यही है कि देश के आम उपभोक्ताओं को सही कीमत पर भरोसेमंद और सुरक्षित ऊर्जा मिलती रहे। मिसरी ने साफ कहा कि जब कोई देश 80–85 प्रतिशत तक ऊर्जा आयात पर निर्भर होता है, तो उसे महंगाई और सप्लाई दोनों की चिंता करनी पड़ती है। इसलिए भारत का पहला फोकस अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करना है।
क्या भारत ग्लोबल एनर्जी मार्केट को स्थिर करता है?
विदेश सचिव के मुताबिक, भारत सिर्फ़ एक बड़ा उपभोक्ता नहीं है, बल्कि ग्लोबल एनर्जी मार्केट को स्थिर रखने वाला अहम फैक्टर भी है। भारत दर्जनों देशों से तेल आयात करके कीमतों और सप्लाई में संतुलन बनाए रखने में योगदान देता है। इस पूरे बयान का सार साफ है कि भारत तेल राजनीति से नहीं, रणनीति से खरीदता है। राष्ट्रीय हित, सही कीमत और भरोसेमंद सप्लाई ही भारत के फैसलों का आधार हैं। चाहे अमेरिका हो, रूस हो या कोई और देश-भारत के लिए सबसे पहले अपने नागरिक और उनकी ज़रूरतें हैं।
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