सार
Akshaya Tritiya 2025: अक्षय तृतीया से जुड़ी अनेक मान्यताएं हैं। कहते हैं कि इसी तिथि पर आदि गुरु शंकराचार्य ने कनकधारा स्त्रोत की रचना की और पाठ किया जिससे प्रसन्न होकर देवी लक्ष्मी ने सोने की बारिश की थी।
Akshaya Tritiya 2025: इस बार अक्षय तृतीया का पर्व 30 अप्रैल, बुधवार को मनाया जाएगा। अक्षय तृतीया साल में आने वाले 4 शुभ मुहूर्त में से एक है। इस दिन किया गया कोई भी उपाय, पूजा-पाठ आदि का संपूर्ण फल मिलता है। इस दिन सोना खरीदने की विशेष मान्यता है, कहते हैं इस दिन खरीदा गया सोना घर में सुख-समृद्धि लाता है। इस मान्यता से जुड़ी एक कथा भी है जो आदि गुरु शंकराचार्य से जुड़ी है। जानें क्या है ये कथा…
ये है अक्षय तृतीया और सोने से जुड़ी कथा
मान्यता के अनुसार, एक बार आदि गुरु शंकराचार्य भिक्षा मांगते-मांगते एक गरीब ब्राह्मण के घर पहुंचे। उस ब्राह्मण के घर पर उन्हें देने को कुछ भी नहीं था। फिर भी उसने भिक्षा के रूप में आदि गुरु शंकराचार्य को एक सूखा आंवला दिया। आदि गुरु शंकराचार्य ने जब ये देखा तो उन्होंने कुछ विशेष मंत्रों की रचना की और पाठ किया, जिससे प्रभाव से देवी लक्ष्मी ने प्रसन्न होकर उस ब्राह्मण के घर सोने की बारिश कर दी। यही मंत्र कनकधारा स्त्रोत कहलाए। कनक का अर्थ ही सोना होता है।
अक्षय तृतीया पर करें कनकधारा स्त्रोत का पाठ
आदि गुरु शंकराचार्य ने जिस दिन कनकधारा स्त्रोत का पाठ कर सोने की बारिश करवाई थी, उस दिन वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि थी, जिसे हम अक्षय तृतीया कहते हैं। इसलिए इस दिन यदि कोई व्यक्ति विधि-विधान से कनकधारा स्त्रोत का पाठ करे तो उसे धन लाभ के योग बन सकते हैं और देवी लक्ष्मी की कृपा भी उस पर बनी रहती है।
श्री कनकधारा स्तोत्रं (Kankdhara Strotra Lyrics In Hindi)
अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:।।1।।
मुग्ध्या मुहुर्विदधती वदनै मुरारै: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकर विमहोत्पले या सा मै श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया:।।2।।
विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर सहोदरमिन्दिराय:।।3।।
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्।
आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगरायांगनाया:।।4।।
बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला कल्याण भावहतु मे कमलालयाया:।।5।।
कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव्।
मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:।।6।।
प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्य भाजि: मधुमायनि मन्मथेन।
मध्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्द्ध मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।।7।।
दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम स्मिभकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण।
दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह:।।8।।
इष्टा विशिष्टमतयो पि यथा ययार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते।
दृष्टि: प्रहूष्टकमलोदर दीप्ति रिष्टां पुष्टि कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टराया:।।9।।
गीर्देवतैति गरुड़ध्वज भामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।
सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै ।।10।।
श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै नमोस्तु रमणीय गुणार्णवायै।
शक्तयै नमोस्तु शतपात्र निकेतानायै पुष्टयै नमोस्तु पुरूषोत्तम वल्लभायै।।11।।
नमोस्तु नालीक निभाननायै नमोस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै ।
नमोस्तु सोमामृत सोदरायै नमोस्तु नारायण वल्लभायै।।12।।
सम्पतकराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि।
त्व द्वंदनानि दुरिता हरणाद्यतानि मामेव मातर निशं कलयन्तु नान्यम्।।13।।
यत्कटाक्षसमुपासना विधि: सेवकस्य कलार्थ सम्पद:।
संतनोति वचनांगमानसंसत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे।।14।।
सरसिजनिलये सरोज हस्ते धवलमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम्।।15।।
दग्धिस्तिमि: कनकुंभमुखा व सृष्टिस्वर्वाहिनी विमलचारू जल प्लुतांगीम।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम्।।16।।
कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:।
अवलोकय माम किंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया : ।।17।।
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिर भूमिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते बुधभाविताया:।।18।।
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