BJP Victory in West Bengal: पश्चिम बंगाल में करीब 8 दशकों के लंबे इंतजार के बाद हिंदुत्व की राजनीति ने सत्ता में वापसी की है। 1941 के बाद यह पहली बार है, जब राज्य में इस विचारधारा की सरकार बन रही है। इस जीत के साथ ही बंगाल, बिहार और ओडिशा में एक ही विचारधारा के शासन का मिशन-ईस्टय भी पूरा हो गया है।
PM Modi-Amit Shah Mission East: पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज वो हो गया जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की थी। करीब 8 दशकों के लंबे इंतजार के बाद बंगाल में हिंदुत्व की राजनीति ने सत्ता के शिखर को छुआ है। दोपहर के रुझानों ने साफ कर दिया है कि बीजेपी 193 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जा रही है, जबकि ममता बनर्जी की TMC महज 90 के आसपास सीटों पर थमती दिख रही है। हैरानी की बात यह है कि बीजेपी का वोट शेयर तो सिर्फ 7% बढ़ा, लेकिन सीटों के मामले में उसने 117 सीटों की लंबी छलांग लगा दी। ममता बनर्जी का वो 'अजेय' किला भी ढह गया जहां वो पिछले 15 सालों से राज कर रही थीं। आखिर ये 'खेला' हुआ कैसे? आइए समझते हैं बीजेपी की जीत के 5 बड़े कारण, मोदी-शाह के मिशन ईस्ट के पूरा होने का मतलब और सियासी मायने...
बंगाल में बीजेपी की जीत के 5 सबसे बड़े कारण
1. 'माछ-भात' और 'मां काली' का दांव
बीजेपी ने बंगाल की संस्कृति को अपना हथियार बनाया। ममता बनर्जी ने जब कहा कि बीजेपी आई तो मछली-भात खाना बंद हो जाएगा, तो बीजेपी नेताओं ने खुद मछली खाकर जवाब दिया कि उनका हिंदुत्व बंगाल की थाली के खिलाफ नहीं है। साथ ही, टीएमसी के 'काबा-मदीना' वाले बयानों के सामने बीजेपी ने 'जय मां काली' का नारा बुलंद कर दिया, जिससे हिंदू वोटर्स एक तरफ लामबंद हो गए।
2. महिलाओं के लिए ₹3000 का मास्टरस्ट्रोक
ममता बनर्जी का सबसे मजबूत आधार महिलाएं थीं। बीजेपी ने इसे तोड़ने के लिए 'लक्ष्मीर भंडार' के जवाब में हर महीने ₹3000 देने का वादा किया। साथ ही, संदेशखाली और आरजी कर जैसी घटनाओं की पीड़ित महिलाओं के परिजनों को टिकट देकर बीजेपी ने सुरक्षा के मुद्दे पर दीदी के महिला वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा दी।
3. वोटर लिस्ट का 'शुद्धिकरण' अभियान
चुनाव से ठीक पहले SIR के जरिए वोटर लिस्ट से करीब 91 लाख नाम हटाए गए। इनमें एक बड़ी संख्या उन नामों की थी जिन्हें बीजेपी 'अवैध घुसपैठिया' बताती रही है। जानकारों का मानना है कि इस कदम से टीएमसी के कई मजबूत गढ़ों में समीकरण पूरी तरह बदल गए।
4. आक्रामक लेकिन 'मर्यादित' प्रचार
पिछली बार 'दीदी-ओ-दीदी' जैसे नारों से ममता को सहानुभूति मिली थी, इसलिए इस बार बीजेपी ने उन पर निजी हमले बंद कर दिए। इसकी जगह उन्होंने सिंडिकेट राज, बेरोजगारी और सुरक्षा को मुद्दा बनाया। योगी आदित्यनाथ और हेमंत बिस्वा सरमा जैसे नेताओं ने कानून-व्यवस्था पर टीएमसी को जमकर घेरा।
5. अमित शाह का माइक्रो-मैनेजमेंट और पन्ना प्रमुख
अमित शाह ने खुद 15 दिनों तक बंगाल में कैंप किया और रात 3-3 बजे तक बैठकें कीं। उन्होंने 'पन्ना प्रमुख' सिस्टम लागू किया, जिसमें एक कार्यकर्ता को सिर्फ 30-60 वोटर्स को बूथ तक लाने की जिम्मेदारी दी गई। इसी बूथ लेवल मैनेजमेंट ने हारी हुई बाजी को जीत में बदल दिया।
मोदी-शाह का 'मिशन ईस्ट' पूरा और जीत के मायने
83 साल बाद बंगाल में हिंदुत्व विचारधारा की बड़ी वापसी
बंगाल में 1941 के बाद यह पहली बार है जब हिंदुत्व की विचारधारा वाली राजनीति सत्ता में लौटी है। बदला हुआ नैरेटिव दिख रहा है। लंबे समय तक कांग्रेस, लेफ्ट और फिर टीएमसी के प्रभाव में रहे बंगाल में अब 'जय मां काली' और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नया दौर शुरू होने वाला है।
मोदी-शाह का मिशन-ईस्ट पूरा
पीएम मोदी और अमित शाह ने 'मिशन ईस्ट' के तहत बिहार (अंग), बंगाल (बंग) और ओडिशा (कलिंग) को जीतने का जो लक्ष्य रखा था, वह अब पूरा हो गया है। 1970 के दशक के बाद यह पहला मौका है, जब इन तीनों बड़े राज्यों में एक ही राजनीतिक विचारधारा की सरकारें होंगी, जिससे केंद्र और राज्यों के बीच तालमेल का नया ढांचा बनेगा।
विपक्ष का सबसे मजबूत किला ढहा
ममता बनर्जी को विपक्ष का सबसे साहसी और 'स्ट्रीट फाइटर' नेता माना जाता था। उनकी हार से राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन का मनोबल काफी कमजोर होगा। विपक्षी खेमे में राहुल गांधी के बाद ममता बनर्जी को ही प्रधानमंत्री पद का सबसे बड़ा दावेदार देखा जाता था, लेकिन राज्य में सत्ता गंवाने के बाद उनकी दावेदारी पर सवाल उठ सकते हैं।
बीजेपी अब अपने पीक पर
इस जीत के साथ बीजेपी फिर से अपने उस दौर में पहुंच गई है, जब उसका देशभर में सबसे ज्यादा प्रभाव था। अब देश के 22 राज्यों में NDA की सरकारें होंगी, जिनमें से 17 राज्यों में अकेले बीजेपी के मुख्यमंत्री होंगे।
महिलाएं बनीं निर्णायक 'पावर सेंटर'
बंगाल के नतीजों ने साबित कर दिया है कि अब महिलाएं किसी भी पार्टी के लिए सबसे निर्णायक वोट बैंक बन चुकी हैं। बीजेपी ने महिलाओं को ₹3000 देने का जो वादा किया, उसने ममता बनर्जी के कोर वोट बैंक में सेंध लगा दी। यह मॉडल आने वाले 2029 के लोकसभा चुनाव की दिशा तय कर सकता है।
बीजेपी के माइक्रो-मैनेजमेंट की जीत
अमित शाह ने खुद 15 दिनों तक बंगाल में रहकर 80 हजार पोलिंग बूथों का डेटा खंगाला। यूपी की तर्ज पर 'पन्ना प्रमुख' तैनात किए गए, जिन्होंने एक-एक वोटर को घर से निकालकर बूथ तक पहुंचाया। यही वो बारीक प्लानिंग थी जिसने ममता बनर्जी के 'खेला' को फेल कर दिया।


