थलपति विजय का सक्सेस सीक्रेट: जो चिरंजीवी-पवन कल्याण न कर सके, वो विजय ने कैसे किया?
तमिलनाडु में थलपति विजय अपनी पहली ही चुनावी कोशिश में सत्ता हासिल करने की ओर बढ़ रहे हैं। आखिर जो काम चिरंजीवी और पवन कल्याण जैसे दिग्गज नहीं कर पाए, वो विजय के लिए कैसे मुमकिन हो रहा है? आइए समझते हैं।
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फिल्म स्टार्स का राजनीति में आना आम बात है। तमिलनाडु में MGR और तेलुगु राज्यों में NTR जैसे दिग्गज पहली ही कोशिश में मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन उनके बाद चिरंजीवी, पवन कल्याण, कमल हासन और विजयकांत जैसे कई बड़े नाम पहली बार में सफल नहीं हो सके। अब तमिलनाडु में थलपति विजय 2026 चुनावों के लिए तैयार हैं और उनकी सफलता की भविष्यवाणी की जा रही है।
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मेगास्टार चिरंजीवी ने 26 अगस्त 2008 को 'प्रजा राज्यम पार्टी' बनाई। पार्टी बनाने के सिर्फ सात महीने बाद ही अप्रैल में चुनाव हुए। जबरदस्त माहौल के बावजूद, उनकी पार्टी तीसरे स्थान पर खिसक गई और सिर्फ 18 सीटें ही जीत सकी। उस समय कांग्रेस ने 156, TDP ने 92 और TRS ने 10 सीटें जीती थीं। सत्ता में आने का सपना देख रहे चिरंजीवी के लिए यह एक बड़ा झटका था।
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चिरंजीवी की हार की एक बड़ी वजह गलत समय पर राजनीति में आना था। उस वक्त YS राजशेखर रेड्डी के नेतृत्व में कांग्रेस बहुत मजबूत थी और विपक्ष में TDP का भी दबदबा था। साथ ही, तेलंगाना को अलग राज्य बनाने का आंदोलन भी चरम पर था। ऐसे में किसी तीसरी पार्टी के लिए कोई जगह नहीं बची थी। बाद में, चिरंजीवी ने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया और केंद्र में पर्यटन मंत्री बने, जिसके बाद उन्होंने राजनीति से दूरी बना ली।
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जब बड़े भाई चिरंजीवी राजनीति में असफल रहे, तो छोटे भाई पवन कल्याण ने मोर्चा संभाला। उन्होंने 14 मार्च 2014 को 'जनसेना पार्टी' की घोषणा की। लेकिन दो महीने बाद ही आंध्र प्रदेश का बंटवारा हो गया, जिससे पवन सिर्फ आंध्र की राजनीति तक सिमट कर रह गए। तेलंगाना में KCR की TRS और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर थी, इसलिए वहां जनसेना कोई प्रभाव नहीं डाल सकी।
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आंध्र प्रदेश में पवन कल्याण को चंद्रबाबू नायडू और YS जगन जैसे दो बड़े नेताओं का सामना करना पड़ा। 2014 में, नए राज्य के लिए लोगों ने अनुभवी नेता चंद्रबाबू नायडू को चुना, जिन्हें पवन ने भी समर्थन दिया था। वहीं, पिता YS राजशेखर रेड्डी की मौत के बाद सहानुभूति और 'ओदार्पु यात्रा' से YS जगन ने जमीनी स्तर पर मजबूत पकड़ बना ली थी। इन दो ध्रुवों के बीच पवन अपनी जगह नहीं बना पाए।
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जनसेना ने पहली बार 2019 में अकेले चुनाव लड़ा और नतीजा बेहद निराशाजनक रहा। YS जगन की लहर में पार्टी सिर्फ 1 सीट जीत सकी, जबकि जगन की YSRCP ने 175 में से 151 सीटें जीतीं। पवन कल्याण खुद जिन दो सीटों से लड़े, दोनों पर हार गए। लोगों को यह भी भरोसा नहीं था कि पवन फिल्मों को छोड़कर पूरी तरह राजनीति करेंगे, जिसका उन्हें नुकसान हुआ।
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पवन की शुरुआती नाकामी के पीछे बड़े भाई का राजनीतिक रिकॉर्ड और उन पर हुए निजी हमले भी एक वजह थे। हालांकि, हाल के चुनावों में TDP-BJP के साथ गठबंधन ने कमाल कर दिया। जनसेना ने लड़ी गईं सभी 21 सीटें जीतीं और पवन अब आंध्र प्रदेश के डिप्टी सीएम हैं। लेकिन अकेले दम पर सीएम बनना अभी भी एक सपना ही लगता है।
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तो फिर विजय के सफल होने की क्या गारंटी है? वजह है तमिलनाडु का 'पॉलिटिकल वैक्यूम' यानी राजनीतिक खालीपन। सत्ताधारी DMK के खिलाफ लोगों में नाराजगी है और जयललिता के बिना AIADMK कमजोर पड़ गई है। विजय ने सही समय पर एंट्री की है। उन्होंने दो साल तक जमीनी काम किया है और युवाओं को अपनी तरफ खींचा है। यही चीज उन्हें चिरंजीवी और पवन से अलग बनाती है और उनकी सफलता का कारण बन सकती है।
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