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उत्तर भारतीय दक्षिण में सिर्फ पानी पूरी बेचने आते हैं: तमिलनाडु के मंत्री का चौंकाने वाला बयान
DMK Language Politics: तमिलनाडु के मंत्री के बयान ने सियासी भूचाल ला दिया है। “उत्तर भारतीय सिर्फ़ हिंदी जानते हैं, पानी पूरी बेचने आते हैं”—क्या यह भाषा नीति की सच्चाई है या चुनावी चाल? दो-भाषा बनाम तीन-भाषा विवाद फिर गरमाया।

Tamil Nadu Minister Statement: तमिलनाडु में एक बार फिर भाषा का मुद्दा चर्चा के केंद्र में आ गया है। विधानसभा चुनाव से कुछ ही हफ्ते पहले राज्य के कृषि मंत्री एमआरके पनीरसेल्वम का एक बयान सामने आया, जिसने उत्तर भारतीयों, हिंदी भाषा और प्रवासी मज़दूरों को लेकर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया। क्या यह सिर्फ़ एक बयान है या इसके पीछे कोई राजनीतिक रणनीति छुपी है?
मंत्री ने ऐसा क्या कहा जिसने विवाद खड़ा कर दिया?
एमआरके पनीरसेल्वम ने कहा कि उत्तर भारतीय सिर्फ़ हिंदी सीखते हैं, इसलिए उन्हें तमिलनाडु में अच्छी नौकरियाँ नहीं मिलतीं और वे छोटे-मोटे काम करने आते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि तमिल लोग दो-भाषा नीति के कारण अंग्रेज़ी सीखते हैं और विदेशों में बड़ी नौकरियां पाते हैं। इस बयान में “पानी पूरी बेचने” जैसी टिप्पणी ने आग में घी डाल दिया।
Tamil Nadu DMK Agriculture Minister MRK Panneer mocked North Indian migrants as “table cleaners and pani puri sellers”
This is the real face of divisive DMK’s in sync with RAHUL GANDHI Congress’ politics of DIVIDE & RULE!
Discrimination is their common language.
SHAME! pic.twitter.com/3K6eb8zGye— Pradeep Bhandari(प्रदीप भंडारी)🇮🇳 (@pradip103) February 5, 2026
क्या भाषा सच में रोज़गार तय करती है?
यह सवाल सबसे अहम है। क्या किसी इंसान की काबिलियत उसकी भाषा से तय की जा सकती है? देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग काम की तलाश में दूसरे राज्यों में जाते हैं। ऐसे में किसी पूरे समुदाय को एक ही नज़र से देखना क्या सही है? यही वजह है कि इस बयान को कई लोग अपमानजनक और भेदभावपूर्ण बता रहे हैं।
दो-भाषा बनाम तीन-भाषा नीति का असली विवाद क्या है?
तमिलनाडु लंबे समय से दो-भाषा नीति अपनाता आया है, जिसमें तमिल और अंग्रेज़ी पढ़ाई जाती है। केंद्र सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) में तीन-भाषा फॉर्मूले की बात की गई है। राज्य सरकार का आरोप है कि यह गैर-हिंदी राज्यों पर हिंदी थोपने की कोशिश है। यही पुराना विवाद एक बार फिर नए रूप में सामने आ गया है। मंत्रियों की ये टिप्पणियां ऐसे समय पर आई हैं जब तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं। सत्ताधारी DMK लगातार दूसरी बार सत्ता में आने की कोशिश कर रही है, जबकि AIADMK और BJP गठबंधन चुनौती दे रहा है। भाषा तमिलनाडु में भावनात्मक मुद्दा रहा है, इसलिए इसे चुनावी हथियार के तौर पर देखा जा रहा है।
सरकार के भीतर ही अलग-अलग सुर क्यों?
जहाँ कृषि मंत्री का बयान विवादित रहा, वहीं उद्योग मंत्री टीआरबी राजा ने ज्यादा संतुलित बात कही। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में हिंदी बोलने वालों पर कोई रोक नहीं है और राज्य तमिल भाषा की रक्षा भी करेगा। इससे साफ है कि सरकार के भीतर भी इस मुद्दे पर एक राय नहीं है। तमिलनाडु में हिंदी विरोध का इतिहास 1930 और 1960 के दशक तक जाता है, जब भाषा को लेकर बड़े आंदोलन और दंगे हुए थे। यही वजह है कि आज भी भाषा से जुड़ा हर बयान लोगों की भावनाओं को जल्दी छू जाता है। यह विवाद सिर्फ़ भाषा का नहीं, बल्कि सम्मान, पहचान और राजनीति का भी है। आने वाले चुनावों में इसका जवाब शायद जनता ही देगी।
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