एक पल की पहचान, देशभर की बहस: आखिर कौन हैं मोहम्मद दीपक और क्यों हैं चर्चा में?
Who is Mohammad Deepak? क्या एक नाम से धर्म की दीवारें टूट सकती हैं? 26 जनवरी को कोटद्वार में दीपक कुमार ने मुस्लिम दुकानदार के बचाव में खुद को “मोहम्मद दीपक” बताया। यह सिर्फ पहचान थी या इंसानियत का साहसिक संदेश?

Deepak Kumar Kotdwar: 26 जनवरी 2026, जब पूरा देश 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा था, उसी दिन उत्तराखंड के कोटद्वार से एक ऐसी घटना सामने आई जिसने सोशल मीडिया से लेकर राष्ट्रीय बहस तक सबका ध्यान खींच लिया। एक आम जिम ट्रेनर दीपक कुमार अचानक “मोहम्मद दीपक” नाम से मशहूर हो गए। आख़िर यह नाम क्यों और इसके पीछे कहानी क्या है?
कोटद्वार में दुकान के नाम पर विवाद कैसे शुरू हुआ?
यह मामला कोटद्वार की एक छोटी सी कपड़ों की दुकान “बाबा स्कूल गारमेंट्स” से जुड़ा है। कुछ हिंदू संगठनों ने दुकान के नाम पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि “बाबा” शब्द हिंदू धार्मिक परंपरा से जुड़ा है और एक मुस्लिम दुकानदार को यह नाम नहीं रखना चाहिए, खासकर जब पास में सिद्धबली बाबा हनुमान मंदिर है।
दुकानदार वकील अहमद ने क्या सफाई दी?
दुकान के मालिक वकील अहमद ने साफ कहा कि उनकी दुकान लगभग 30 सालों से चल रही है और इससे पहले कभी किसी ने आपत्ति नहीं की। उन्होंने बताया कि “बाबा” शब्द किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है और अलग-अलग समुदायों में इसका इस्तेमाल होता रहा है।
"My Name is Mohammed Deepak"- How this Hindu man stood between a Bajrang Dal-linked mob and 'Baba' an elderly Muslim Shopkeeper in Kotdwar, Uttarakhand. The Mob was demanding the shopkeeper change his shop name. Full report @themojostorypic.twitter.com/uXLTh4TJEF
— barkha dutt (@BDUTT) January 31, 2026
दीपक कुमार ने बीच में दखल क्यों दिया?
जब विवाद बढ़ने लगा और माहौल तनावपूर्ण हो गया, तभी दीपक कुमार ने बातचीत में दखल दिया। वे बजरंग दल और दूसरे समूहों के सदस्यों से शांतिपूर्वक बात करने लगे। इसी दौरान उनसे उनकी पहचान पूछी गई।
दीपक कुमार ने खुद को “मोहम्मद दीपक” क्यों बताया?
यही वह पल था जिसने पूरी कहानी को बदल दिया। दीपक ने खुद को “मोहम्मद दीपक” बताया। बातचीत में उन्होंने कहा कि यह नाम उनके मन में अपने-आप आया। उनका मकसद सिर्फ इतना था कि वे किसी धर्म की पहचान से नहीं, बल्कि एक भारतीय नागरिक के रूप में देखे जाएं। दीपक ने साफ कहा, “मैं न हिंदू हूं, न मुस्लिम, न सिख, न ईसाई-मैं सिर्फ एक इंसान हूं।” उनका मानना है कि सबसे बड़ा धर्म इंसानियत है और मरने के बाद इंसान के कर्म ही पहचाने जाते हैं।
इस घटना के बाद दीपक की ज़िंदगी कैसे बदली?
26 जनवरी के बाद दीपक की ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई। उन्हें देशभर से फोन कॉल और मैसेज मिलने लगे। ज़्यादातर लोग उनके समर्थन में थे। हालांकि, इसका असर उनकी रोज़ी-रोटी पर भी पड़ा। उनका जिम फिलहाल बंद है और घर का खर्च उनकी माँ की चाय की दुकान से चल रहा है।
दीपक का पारिवारिक और निजी जीवन कैसा है?
दीपक एक साधारण परिवार से आते हैं। उनके पिता का 15 साल पहले निधन हो चुका है। वे शादीशुदा हैं और एक बेटी के पिता हैं। उनकी माँ आज भी कोटद्वार में चाय की दुकान चलाती हैं। दीपक पिछले करीब 30 सालों से फिटनेस के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। इतनी मुश्किलों के बावजूद दीपक कहते हैं कि उन्हें लोगों से जो प्यार मिला है, वही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। वे लोगों से नफरत छोड़कर समझदारी और इंसानियत को अपनाने की अपील करते हैं। “नफरत फैलाने से कुछ हासिल नहीं होता। मैं चाहता हूं कि लोग सही रास्ता चुनें, गलत नहीं।”
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