ईरान ने सऊदी अरब की अरामको रिफाइनरी पर ड्रोन हमला किया, जिससे एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रभावित हुआ। सऊदी के साथ डिफेंस समझौते के बावजूद पाकिस्तान ने संतुलित रुख अपनाया है और युद्ध से दूरी बनाकर शांति की अपील की है।

Pakistan-Saudi Arab Defense Agreement: ईरान इस समय आर-पार की लड़ाई के मूड में है। खासकर सऊदी अरब को लेकर ईरान की नाराजगी उसके हमलों में साफ दिखती है। सोमवार को ईरान ने सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी Saudi Aramco रिफाइनरी पर हमला कर पूरी दुनिया को दहला दिया। हमले के बाद इसे अस्थायी तौर पर बंद करना पड़ा है। इतना ही नहीं, ईरान ने इससे पहले राजधानी रियाद समेत सऊदी अरब के कई प्रमुख शहरों को निशाना बनाया है। ईरान एक के बाद एक सऊदी अरब पर मिसाइलें बरसा रहा है, लेकिन उसका दोस्त पाकिस्तान चुप है। आखिर क्यों?

सऊदी पर हमले के बाद पाकिस्तान पर नजर

सऊदी अरब पर हमले के बाद हर किसी की निगाहें इस वक्त पाकिस्तान पर हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि सितंबर 2025 में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक अहम डिफेंस डील हुई है। इस समझौते में दोनों देशों के शीर्ष नेताओं और सैन्य नेतृत्व ने नाटो स्टाइल में डील की थी। इसके तहत पाकिस्तान या सऊदी अरब पर हुआ हमला दोनों देशों पर हमला माना जाएगा। हालांकि, सऊदी अरब पर कई हमलों के बावजूद पाकिस्तान ने चुप्पी साध रखी है, जिससे सवाल खड़े हो रहे हैं।

डिफेंस एग्रीमेंट के बावजूद संतुलित रुख

सऊदी अरब के साथ स्ट्रेटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट होने के बावजूद पाकिस्तान ने सैन्य कार्रवाई के बजाय एकजुटता को प्राथमिकता दी है। ईरान से जुड़े हालिया घटनाक्रम पर पाकिस्तान ने बहुत संतुलित बयान दिए हैं। इसकी एक बड़ी वजह ईरान के साथ उसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और कूटनीतिक संबंध हैं। इस्लामाबाद और तेहरान के बीच उच्च स्तरीय दौरे और क्षेत्रीय मुद्दों पर सहयोग जारी रहा है। ईरान ने भी कई क्षेत्रीय संकटों के दौरान पाकिस्तान के समर्थन की सराहना की है, जो दोनों देशों के पारंपरिक मित्रवत रिश्तों को दर्शाता है। साथ ही सऊदी अरब से पाकिस्तान के पुराने संबंध हैं।

ईरान से सीधी जंग पाकिस्तान को क्यों पड़ेगी भारी?

ईरान के साथ खुली जंग में जाना पाकिस्तान के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। दोनों देशों के बीच लंबी और संवेदनशील सीमा है। ऐसी किसी लड़ाई से पाकिस्तान के अंदर सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है। ऐसे में ईरान के खिलाफ सीधी सैन्य कार्रवाई पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के लिए बेहद मुश्किल फैसला होगा।

सऊदी-पाकिस्तान डिफेंस डील का भविष्य

विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुआ समझौता एक औपचारिक राजनीतिक संकेत है। इसे बिना शर्त सैन्य हस्तक्षेप की गारंटी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। संभावना है कि पाकिस्तान समझौते को बनाए रखते हुए युद्ध में सीधे शामिल होने से बचेगा।

कई मोर्चों पर दबाव में पाकिस्तान

इस समय पाकिस्तान अपने उत्तर-पश्चिमी सीमा क्षेत्र में अफगानिस्तान के साथ तनाव का सामना कर रहा है। इसके अलावा भारत के साथ उसके रिश्ते भी लंबे समय से तनावपूर्ण हैं। आर्थिक तंगहाली और तालिबान से अंदरूनी लड़ाई लड़ रहे पाकिस्तान के लिए फिलहाल एक नया मोर्चा खोलना किसी खतरे से कम नहीं होगा। यही वजह है कि पाकिस्तान ने इस पूरे मामले में आक्रामक बयान देने के बजाय शांति की अपील की है। मतलब साफ है, पाकिस्तान इस समय एक कठिन कूटनीतिक संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है, ताकि वह किसी भी पक्ष से सीधे टकराव में न आए।