33% Women Reservation Bill 2026 लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत न मिलने से अटका। 298 समर्थन बनाम 230 विरोध के बीच महिला आरक्षण विधेयक पास नहीं हो सका। 30 साल पुराना संघर्ष, परिसीमन विवाद, राजनीतिक विरोध और सत्ता संतुलन इसे रोकते रहे। महिला राजनीतिक सशक्तिकरण अब भी अधूरा।
Women Quota Bill 2026: 17 अप्रैल 2026 की देर रात लोकसभा में जिस विधेयक को लेकर उम्मीदें चरम पर थीं, उसका अंत एक बार फिर निराशा में हुआ। 33% महिला आरक्षण को संवैधानिक दर्जा देने वाला “संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026” और उससे जुड़े परिसीमन प्रस्ताव संसद के भीतर राजनीतिक सहमति की दीवार नहीं तोड़ पाए। मतदान में 298 सांसदों ने समर्थन किया, लेकिन 352 के आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से यह संख्या काफी कम रह गई। सरकार का दावा था कि यह प्रस्ताव पुराने विवादों का समाधान है-नई सीटों का विस्तार, 2011 जनगणना आधारित परिसीमन और 2029 से बिना किसी मौजूदा सांसद की सीट काटे महिलाओं के लिए आरक्षण। फिर भी विधेयक आगे नहीं बढ़ सका।
30 साल का अधूरा संघर्ष: बार-बार क्यों अटका महिला आरक्षण?
महिला आरक्षण का मुद्दा नया नहीं है।
- 1996 से लेकर अब तक यह कई सरकारों के एजेंडे में रहा, लेकिन हर बार किसी न किसी राजनीतिक बाधा ने इसे रोक दिया।
- 1996 में पहली बार विधेयक आया, लेकिन सरकार गिरने से प्रक्रिया अधूरी रह गई।
- 1998 से 2003 के बीच विरोध मुख्य रूप से क्षेत्रीय दलों से आया, जिन्होंने ओबीसी आरक्षण को प्राथमिकता का मुद्दा बनाया।
- 1998 में तो संसद के भीतर विधेयक फाड़े जाने की घटना ने राजनीतिक तनाव को चरम पर पहुंचा दिया।
- 2004-2014: कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के पास पूर्ण बहुमत था।
- 2010 में राज्यसभा से पास होने के बावजूद लोकसभा में इसे आगे नहीं बढ़ाया गया। यह वह दौर था जब बहुमत मौजूद होने के बावजूद राजनीतिक इच्छाशक्ति पर सवाल उठे।
सत्ता बनाम समानता: असली टकराव कहां है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि महिला आरक्षण का विरोध विचारधारा से ज्यादा सत्ता संतुलन का सवाल रहा है। पंचायत स्तर पर महिलाओं के लिए आरक्षण स्वीकार किया गया क्योंकि वहां सत्ता का प्रभाव सीमित है। लेकिन संसद में 33% हिस्सेदारी राजनीतिक समीकरण बदल देती है-यही असली प्रतिरोध की जड़ है।
जमीनी बदलाव बनाम संसद की जड़ता
भारत में आज लाखों महिलाएं पंचायत, शिक्षा, प्रशासन और स्थानीय शासन में नेतृत्व कर रही हैं। कई राज्यों में पंचायतों में लगभग आधी सीटें महिलाओं के पास हैं। इसके बावजूद राष्ट्रीय राजनीति में उनकी हिस्सेदारी सीमित बनी हुई है। सरकारी योजनाओं-स्वच्छ भारत, उज्ज्वला योजना, जनधन और आवास योजनाओं-ने महिलाओं को सामाजिक रूप से मजबूत किया, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व अभी भी अधूरा है।
क्या अगला अध्याय अभी बाकी है?
17 अप्रैल 2026 की रात ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि महिला आरक्षण सिर्फ कानून का मुद्दा नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की परीक्षा है। सवाल यह है कि क्या अगली बार संसद इस ऐतिहासिक अवसर को पूरा कर पाएगी, या यह सपना फिर किसी नई तारीख पर टल जाएगा।


