मिडिल ईस्ट में जंग खत्म करने हेतु ईरान-अमेरिका इस्लामाबाद में बातचीत कर रहे हैं। पाकिस्तान की मध्यस्थता के पीछे चीन की अहम भूमिका है, जिसने ईरान को संघर्ष विराम के लिए मनाया। स्थायी समझौते के लिए चीन एक प्रमुख गारंटर के रूप में उभरा है।

मिडिल ईस्ट में चल रही जंग को खत्म करने के लिए ईरान और अमेरिका के दूत इस्लामाबाद में बातचीत की तैयारी कर रहे हैं। आधिकारिक सूत्रों और जानकारों का कहना है कि इस बातचीत की राह बीजिंग ने ही तैयार की थी और स्थायी शांति समझौते के लिए भी चीन एक अहम कड़ी साबित होगा। हालांकि, दोनों दुश्मन देशों के बीच अस्थायी सीजफायर कराने के लिए पाकिस्तान की दुनियाभर में तारीफ हो रही है, लेकिन पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना है कि चीन ने पर्दे के पीछे रहकर जो काम किया है, वो उतना ही ज़रूरी है। मंगलवार रात को तो ये समझौता लगभग टूटने ही वाला था।

बातचीत से जुड़े एक सीनियर पाकिस्तानी अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “सीजफायर वाली रात तो उम्मीदें लगभग खत्म हो गई थीं, लेकिन तभी चीन ने दखल दिया और ईरान को शुरुआती सीजफायर के लिए मना लिया।” उन्होंने आगे कहा, "हमारी कोशिशें बहुत अहम थीं, लेकिन हम कामयाबी से कुछ दूर रह गए थे। आखिर में सफलता तब मिली जब बीजिंग ने ईरानियों को राजी किया।"

कुछ ऐसी ही बात राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कही। सोशल मीडिया पर दो हफ्तों के सीजफायर का ऐलान करने के तुरंत बाद उन्होंने AFP को बताया कि ईरान को बातचीत की टेबल पर लाने में चीन ने अहम भूमिका निभाई थी। इस बातचीत से जंग खत्म होने की एक नाजुक उम्मीद जगी है। ये जंग 28 फरवरी को तब शुरू हुई थी, जब इजरायल और अमेरिका ने हमले शुरू किए और ईरान ने खाड़ी देशों और इजरायली शहरों पर पलटवार किया। इस जंग में हजारों जानें जा चुकी हैं और दुनिया की अर्थव्यवस्था हिल गई है।

पाकिस्तान, जिसके पड़ोसी ईरान के साथ गहरे सांस्कृतिक और धार्मिक रिश्ते हैं और जिसके नेताओं के ट्रंप के साथ भी अच्छे व्यक्तिगत संबंध हैं, दोनों पक्षों की मदद करेगा।पक्का समझौता कराने के लिए पाकिस्तान को होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम जैसे मुश्किल मुद्दों पर दोनों पक्षों को साधना होगा। एक दूसरे राजनयिक सूत्र ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, "पाकिस्तान ने जहाजों की आवाजाही, न्यूक्लियर और दूसरे मामलों पर दोनों पक्षों की मदद के लिए एक्सपर्ट्स की एक टीम बनाई है।"

दूसरे सूत्र और कई पूर्व अधिकारियों ने AFP को बताया कि जैसे ही पाकिस्तान बातचीत की मेज सजा रहा है, सबकी नजरें चीन की भूमिका पर टिकी हैं। सूत्र ने कहा, “चीन से गारंटर बनने का अनुरोध किया गया था। ईरान एक गारंटर चाहता है।” दूसरा विकल्प रूस था, लेकिन वो यूक्रेन में जंग लड़ रहा है। पश्चिमी देश, खासकर यूरोपीय संघ, उसे कभी स्वीकार नहीं करते। इसका मतलब था कि इस काम के लिए चीन ही 'सबसे सही' था।

'सदाबहार दोस्त'

बीजिंग के इस्लामाबाद और तेहरान, दोनों से करीबी रिश्ते हैं। अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों के बावजूद चीन सालों से ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार रहा है। चीन ने राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत पाकिस्तान में अरबों डॉलर का निवेश भी किया है। दोनों सरकारें एक-दूसरे को "सदाबहार दोस्त" (ironclad brothers) कहती हैं। पाकिस्तान के पूर्व सीनेटर और रक्षा व विदेश मामलों की समितियों के प्रमुख मुशाहिद हुसैन सैयद ने कहा, "करीबी साझेदार और पड़ोसी होने के नाते, पाकिस्तान और चीन पहले दिन से ही इस जंग को खत्म करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं।"

उन्होंने आगे कहा, "किसी भी आखिरी शांति समझौते के लिए चीन की भूमिका एक गारंटर के तौर पर बेहद ज़रूरी होगी, क्योंकि ईरान को ट्रंप और (इजरायली प्रधानमंत्री) नेतन्याहू की जोड़ी पर भरोसा नहीं है।" पिछले महीने जब पाकिस्तान के विदेश मंत्री सऊदी, तुर्की और मिस्र के समकक्षों से बात करने के बाद फौरन बीजिंग पहुंचे, तो चीन ने कहा कि वह मध्यस्थता की पाकिस्तानी कोशिशों का समर्थन करता है।

इसके बाद चीन ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ते सशस्त्र संघर्ष को कम करने के लिए भी बातचीत शुरू की। हफ्तों की लड़ाई के बाद चीन के उरुमकी में अफगान सरकार के प्रतिनिधियों और पाकिस्तानी अधिकारियों की मेजबानी की। सीजफायर से कुछ घंटे पहले, चीन ने रूस के साथ मिलकर एक और बड़ा कदम उठाया जो तेहरान को पसंद आया होगा। उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव को वीटो कर दिया। जंग शुरू होने के बाद से ईरान ने यहां एक तरह से नाकाबंदी कर रखी है।

'कठिन चढ़ाई'

चीन ने शांति कायम करने की अपनी कोशिशों का ज्यादा ढिंढोरा नहीं पीटा है। वो बस इतना दोहराता रहा है कि वह मध्यस्थता कर रहा है और दुश्मनी खत्म करने को बढ़ावा दे रहा है। एक विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बताया कि चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने संबंधित देशों के अपने समकक्षों के साथ 26 बार फोन पर बात की, जबकि बीजिंग के मिडिल ईस्ट दूत ने युद्धग्रस्त क्षेत्र में कई दौरे किए। विश्लेषकों और अधिकारियों का कहना है कि आने वाले हफ्तों में चीन खुलकर एक औपचारिक गारंटर की भूमिका निभाएगा, यह भी पक्का नहीं है। दूसरे सूत्र ने AFP को बताया, "उनके अपने हित हैं, वे सार्वजनिक रूप से इस संघर्ष में घसीटे नहीं जाना चाहते।"

बातचीत की राह आसान नहीं है। एक बड़ा पेंच लेबनान को लेकर फंसा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और ईरान इस बात पर जोर दे रहे हैं कि लेबनान को भी सीजफायर में शामिल किया जाए, लेकिन इजरायल इससे इनकार कर रहा है। इजरायल, जिसे पाकिस्तान औपचारिक रूप से मान्यता नहीं देता, लगातार लेबनान में ईरान समर्थित समूह हिजबुल्लाह को निशाना बनाकर घातक हमले कर रहा है। हालांकि, अमेरिका ने कहा है कि वह अगले हफ्ते वाशिंगटन में इजरायली और लेबनानी अधिकारियों के बीच अलग से बातचीत कराएगा। सूत्र ने आखिर में कहा, "बातचीत बहुत जटिल और संवेदनशील है…आम सहमति तक पहुंचने के लिए सभी पक्षों को दर्दनाक समझौते और रियायतें देनी होंगी।"

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