Bastar Pandum 2026 In Hindi: बस्तर पंडुम 2026 ने सुकमा में जनजातीय परंपरा, लोक कला, नृत्य और संस्कृति को संरक्षित किया। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की पहल से कलाकारों को मान और प्रोत्साहन मिला। जानिए पूरी डिटेल।

जगदलपुर, 9 फरवरी 2026: बस्तर की परंपराएं, उसकी जनजातीय पहचान और लोकसंस्कृति का भव्य उत्सव बनकर उभरा “बस्तर पंडुम 2026”। यह सिर्फ एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि सरकार की जनजातीय संरक्षण और संवेदनशील प्रशासन की प्रतिबद्धता का भी प्रत्यक्ष उदाहरण रहा। लाल बाग मैदान में संपन्न समापन समारोह ने पूरे देश का ध्यान बस्तर की गौरवशाली विरासत की ओर आकर्षित किया। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय की दूरदर्शी सोच और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की पहल ने प्रशासन को प्रेरित किया कि वे परंपराओं को समय की धारा में खोने से बचाएं। इस आयोजन में पारंपरिक नृत्य, लोकगीत, जनजातीय वेशभूषा, खानपान और शिल्प को पूरी तरह अपने मूल स्वरूप में प्रस्तुत किया गया। यही इस उत्सव की सबसे बड़ी उपलब्धि रही।

बस्तर पंडुम 2026: विजेताओं को मिला पुरस्कार

सुकमा जिला प्रशासन ने इस आयोजन में बेहतरीन समन्वय और संवेदनशीलता दिखाई। जिले के कलाकारों ने मंच पर बस्तर की आत्मा को जीवंत कर दिखाया। छिंदगढ़ विकासखंड के किंदरवाड़ा निवासी गुंजन नाग और किरण नाग ने जनजातीय वेशभूषा प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर सुकमा और पूरे बस्तर का मान बढ़ाया। इस उपलब्धि पर देश के गृहमंत्री श्री अमित शाह और मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने कलाकारों को स्मृति चिन्ह और 50,000 रुपये का प्रोत्साहन चेक प्रदान किया। यह शासन की कलाकारों के प्रति सम्मान और विश्वास को दर्शाता है।

कलाकारों की सहभागिता और नई उड़ान

सुकमा जिले से 12 विभिन्न विधाओं में 69 कलाकारों की भागीदारी ने यह साबित किया कि प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराए गए मंच और अवसर जनजातीय प्रतिभाओं को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकते हैं। इस सहभागिता का महत्व केवल प्रस्तुति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह आत्मसम्मान, पहचान और भविष्य की उम्मीद का प्रतीक भी बनी।

विकास और परंपरा का संगम

बस्तर पंडुम 2026 यह संदेश देता है कि श्री विष्णुदेव साय सरकार का विकास मॉडल सिर्फ सड़क, भवन और योजनाओं तक सीमित नहीं है। यह जनजातीय अस्मिता, सांस्कृतिक जड़ों और सामाजिक सम्मान को भी बराबर महत्व देता है। यह आयोजन साबित करता है कि जब प्रशासन संवेदनशील हो और नेतृत्व दूरदर्शी, तो विकास और परंपरा एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं।