होरमुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता घटाने हेतु खाड़ी देश वैकल्पिक रास्ते बना रहे हैं। सुरक्षा खतरों को देखते हुए, UAE और सऊदी अरब पाइपलाइन व नए जमीनी मार्गों से तेल निर्यात की योजना बना रहे हैं। यह उनकी आर्थिक सुरक्षा के लिए एक रणनीतिक बदलाव है।
दुनिया के सबसे अहम तेल रूट, होरमुज जलडमरूमध्य पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए खाड़ी देश अब 'प्लान बी' पर काम कर रहे हैं। इस इलाके में सुरक्षा खतरों और ट्रैफिक में रुकावटों को देखते हुए UAE और सऊदी अरब जैसे देश पाइपलाइन और नए जमीनी रास्तों से तेल बाहर निकालने की तैयारी में हैं।
रणनीतिक बदलाव
होरमुज जलडमरूमध्य में कोई भी रुकावट सीधे तौर पर ग्लोबल ऑयल मार्केट और इन देशों की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डालती है। ऐसे में, यह सिर्फ किसी संकट से निपटने की तैयारी नहीं है, बल्कि खाड़ी देश अपने पूरे सप्लाई सिस्टम को ही बदलने की सोच रहे हैं।
इराक-सीरिया बॉर्डर खुला
इसी कड़ी में इराक और सीरिया के बीच राबिया बॉर्डर क्रॉसिंग का दशकों बाद फिर से खुलना एक बड़ा कदम है। 2011 में सीरियाई गृहयुद्ध के बाद बंद हुआ यह रास्ता अब तेल ट्रांसपोर्ट के लिए एक सुरक्षित जमीनी रूट के तौर पर विकसित किया जा रहा है। हालांकि यह समुद्री रास्ते से महंगा है, लेकिन होरमुज के तनाव को देखते हुए इसे एक बेहतरीन विकल्प माना जा रहा है।
सऊदी और UAE के आजमाए हुए वैकल्पिक रास्ते
होरमुज जलडमरूमध्य में रुकावटों के बावजूद तेल एक्सपोर्ट जारी रखने के लिए कुछ पाइपलाइनें पहले से ही इन देशों की मदद कर रही हैं…
- सऊदी अरब: ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन, जो 1,200 किलोमीटर लंबी है। यह फारस की खाड़ी के पास मौजूद तेल के कुओं को लाल सागर पर बने यान्बु पोर्ट से जोड़ती है।
- UAE: ADCOP पाइपलाइन, जो अबू धाबी के हबशान ऑयल फील्ड को ओमान की खाड़ी में फुजैरा पोर्ट से कनेक्ट करती है।
टूरिज्म सेक्टर में भी बदलाव
तेल ट्रांसपोर्ट में संभावित मंदी को देखते हुए दुबई के कई बड़े होटलों ने इस मौके का फायदा उठाते हुए रेनोवेशन का काम शुरू कर दिया है। बुर्ज अल अरब और अरमानी होटल समेत करीब सात प्रीमियम होटलों को या तो पूरी तरह या फिर आंशिक रूप से अस्थायी तौर पर बंद कर दिया गया है। यहां सिर्फ मरम्मत ही नहीं हो रही, बल्कि भविष्य के सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए मॉडर्न सिस्टम भी लगाए जा रहे हैं।
चुनौतियां
हालांकि, इन वैकल्पिक व्यवस्थाओं को पूरी तरह से तैयार होने में अभी कई साल लगेंगे। इसके लिए बड़े पैमाने पर निवेश और खाड़ी देशों के बीच मजबूत सहयोग की जरूरत होगी। लेकिन इतना तय है कि ये कदम खाड़ी क्षेत्र की लंबी अवधि की आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करेंगे।
