Dowry Death In India: भारत में दहेज का खौफनाक सच! NCRB के अनुसार 2017-2022 के बीच 35,493 महिलाओं की दहेज हत्या हुई, हर रोज 20 मौतें। निक्की भाटी और संजू बिश्नोई जैसी घटनाएं कानून और समाज की विफलता उजागर करती हैं। दहेज अब भी मौत का सौदा है।
Dowry Harassment Cases NCRB: भारत में दहेज प्रथा आज भी महिलाओं के लिए मौत का सौदा बन चुकी है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, 2017 से 2022 के बीच 35,493 महिलाएं दहेज के लिए हत्या या आत्महत्या का शिकार हुईं, यानी हर दिन करीब 20 मौतें। ये संख्या न केवल समाज की मानसिकता पर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह भी बताती है कि कानून होने के बावजूद दहेज का खौफ क्यों नहीं घटा। ग्रेटर नोएडा की निक्की भाटी और जोधपुर की संजू बिश्नोई जैसी कहानियां इस भयावहता का ताजा सबूत हैं।
क्यों दहेज प्रथा आज भी समाज में जिंदा है?
दहेज का चलन सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक सोच का हिस्सा बन चुका है। महिला अधिकार कार्यकर्ता योगिता भयाना बताती हैं कि आज भी शादियों में लग्जरी गाड़ियों और महंगे उपहारों का दिखावा होता है। उनका कहना है कि “दहेज महिमामंडन का प्रतीक बन गया है, जहां एक महिला की कीमत उपहारों से तय की जाती है।”
निक्की भाटी केस: आत्महत्या या हत्या का सवाल?
नोएडा के सिरसा गांव में 21 अगस्त को हुई निक्की भाटी की मौत ने पूरे देश को हिला दिया। महज 17 साल की उम्र में शादी और फिर सालों की प्रताड़ना के बाद उसका अंत दहेज विवाद में हुआ। पति विपिन भाटी, सास दयावती, ससुर सतवीर और देवर रोहित गिरफ्तार हुए, लेकिन सवाल वही है-क्या यह हत्या थी या मजबूरी में की गई आत्महत्या? विशेषज्ञों का मानना है कि चाहे कानूनी रूप से यह हत्या साबित हो या नहीं, निक्की की मौत दहेज और मानसिक प्रताड़ना का परिणाम थी।
संजू बिश्नोई: मां-बेटी ने क्यों चुनी मौत?
राजस्थान के जोधपुर में एक सरकारी शिक्षिका संजू बिश्नोई ने अपनी तीन साल की बेटी को गोद में लेकर खुद को आग के हवाले कर दिया। शादी को 10 साल बीत चुके थे, लेकिन ससुरालवालों की दहेज की मांगें खत्म नहीं हुईं। उच्च वेतन के बावजूद वह मानसिक प्रताड़ना से तंग आ गई।
कानून होने के बावजूद क्यों नहीं रुक रहीं दहेज हत्याएं?
भारत में दहेज निषेध अधिनियम 1961 लागू है, और IPC 498A महिलाओं को प्रताड़ना से बचाने के लिए बनाई गई थी। लेकिन वकील सीमा कुशवाहा के मुताबिक, अदालतें अक्सर शादी में दिए गए दहेज को ‘उपहार’ मान लेती हैं। साथ ही, कुछ मामलों में धारा 498A का दुरुपयोग दिखाकर असली पीड़िताओं के केस कमजोर कर दिए जाते हैं।
क्या दहेज पितृसत्तात्मक सोच का हथियार है?
मनोवैज्ञानिक डॉ. श्वेता शर्मा कहती हैं, “चाहे महिलाएं नौकरी कर रही हों या आर्थिक रूप से स्वतंत्र हों, दहेज आज भी पुरुष अहंकार को संतुष्ट करने का माध्यम है। यह सिर्फ सामाजिक प्रथा नहीं, बल्कि महिलाओं पर पितृसत्तात्मक नियंत्रण का प्रतीक है।”
NCRB रिपोर्ट: आंकड़े जो चौंका देते हैं
दक्षिणी कैलिफोर्निया और वर्जीनिया विश्वविद्यालय के अध्ययन में पाया गया कि 90% विवाहों में दहेज की परंपरा मौजूद थी, और 1950 से 1999 के बीच इसका आर्थिक मूल्य 21 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। आज भी हर रोज औसतन 20 महिलाएं दहेज के लिए जान गंवा रही हैं।
कब खत्म होगा दहेज का खौफ?
निक्की भाटी और संजू बिश्नोई जैसी कहानियां बताती हैं कि दहेज सिर्फ प्रथा नहीं, बल्कि मौत का सौदा बन चुका है। सवाल है-क्या समाज और कानून मिलकर इस दानव को कभी खत्म कर पाएंगे?