Dasha Mata Vrat Katha: इस बार दशा माता का व्रत 13 मार्च, शुक्रवार को किया जाएगा। जो भी दशा माता का व्रत पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ करता है, उसे अपने जीवन में किसी भी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता।

Dasha Mata Vrat Katha In Hindi: चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि बहुत ही खास होती है। इस दिन दशा माता का व्रत-पूजा की जाती है। दशा माता कोई और नहीं बल्कि देवी पार्वती का ही एक रूप है जो घर की दशा यानी स्थिति सुधारती है। इस व्रत में दशा माता के साथ-साथ त्रिवेणी (नीम, पीपल और बरगद) वृक्ष की पूजा भी की जाती है। कहते हैं कि दशा माता व्रत का डोरा बांधने से धन संपत्ति की कमी नहीं होती। इस व्रत का पूरा लाभ पाने के लिए कथा का पाठ जरुर करना चाहिए। आगे पढ़ें इस व्रत की संपूर्ण कथा…

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दशा माता व्रत की कथा

किसी समय नल नाम के एक प्रतापी राजा थे, उनकी पत्नी का नाम दमयंती था। रानी दयमंती दशा माता की भक्त थी और उनकी पूजा करती थीं। एक बार दशा माता व्रत करने के बाद रानी दमयंती ने उसका धागा अपने गले में बांधा तो राजा नल ने ये देख लिया। राजा ने जब इसके बारे में पूछा तो रानी ने उन्हें पूरी बात बता दी। राजा नल ने रानी के गले से वह धागा निकाल कर फेंक दिया।

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इस घटना के कुछ दिन बात ही राजा नल जुएं अपना पूरा राज-पाठ हार गए और वन-वन भटकने को मजबूर हो गए। यहां तक कि राजा पर चोरी का आरोप भी लगा। राजा और रानी एक जंगल में लकड़ी काटकर बेचने लगे और इसी से अपना भरण-पोषण करने लगे। तब तक दोबारा दशा माता का व्रत आ चुका था। इस बार राजा और रानी दोनों ने पूरी श्रद्धा और भक्ति से ये व्रत किया।
उसी रात रानी को दशा माता ने सपने में आकर आशीर्वाद दिया। ये बात रानी ने राजा को बताई। राजा ने कहा 'यदि दशा मां सच्ची हैं तो फिर हमारे पहले के दिन लौट आएंगे।' इसके बाद धीरे-धीरे राजा की स्थिति में सुधार आने लगा। कुछ दिनों बाद दशा माता के प्रभाव से राजा को अपना खोया राज्य पुन: मिल गया और राजा-रानी अपने महल में सुखपूर्वक रहने लगे।
दशा माता व्रत के प्रभाव से राज नल और रानी दमयंती अपने महल में आकर सुखपूर्वक रहने लगे। जो भी महिला-पुरुष ये व्रत करता है उसके जीवन में खुशहाली और सुख-समृद्धि बनी रहती है। इसलिए सभी को श्रद्धापूर्वक मां दशा माता की पूजा करनी चाहिए और स्त्रियों को कथा-पूजन कर धागा धारण करना चाहिए।


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