Middle East War Timeline: 90 दिनों में क्या हुआ ऐसा कि बातचीत से युद्ध तक पहुंचा मामला?
शांति वार्ता के बीच ईरान से जंग कैसे छिड़ गई? दिसंबर 2025 के आखिर से 27 फरवरी 2026 तक अमेरिका, ईरान और इज़राइल के बीच आखिर क्या-क्या हुआ, जानिए पूरी कहानी।
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न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस पूरी घटना पर एक विस्तृत रिपोर्ट छापी है। रिपोर्ट के मुताबिक, ये घटनाएं किसी फिल्मी कहानी की तरह हैं। इसमें कहा गया है कि नेतन्याहू ने ही ट्रंप को युद्ध के लिए उकसाया था। नेतन्याहू चाहते थे कि परमाणु वार्ता विफल हो और अमेरिका युद्ध में उतरे।
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इसकी शुरुआत पिछले साल दिसंबर में हुई। 28 दिसंबर को ईरान में व्यापारियों ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया। अगले ही दिन, नेतन्याहू ट्रंप से मिलने उनके मार-ए-लागो एस्टेट पहुंचे। नेतन्याहू ने ईरान के मिसाइल ठिकानों पर हमला करने के लिए ट्रंप से इजाजत मांगी, लेकिन ट्रंप ने यह कहकर टाल दिया कि अभी सही समय नहीं है। असल में अमेरिका और इज़राइल युद्ध के लिए तैयार नहीं थे और उन्हें समय चाहिए था।
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14 जनवरी को नेतन्याहू ने ट्रंप को फोन किया और हमले को जनवरी के अंत तक टालने को कहा। ट्रंप मान गए। इसके बाद इज़राइल के चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल इयाल ज़मीर ने यूएस सेंट्रल कमांड के एडमिरल ब्रैड कूपर से लगातार संपर्क बनाए रखा। इस बीच, CIA ग्राउंड वर्क में जुटी थी।
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इस बीच कूटनीतिक कोशिशें भी हुईं। ओमान ने मध्यस्थता की। 6 फरवरी को पहली बातचीत हुई, जो असफल रही। अमेरिका की मांग थी कि ईरान परमाणु ईंधन बनाने की क्षमता पूरी तरह खत्म कर दे, लेकिन ईरान ने इसे अपना अधिकार बताया। इसी वजह से बातचीत टूट गई।
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इसके चार दिन बाद, नेतन्याहू ट्रंप से मिलने ओवल ऑफिस पहुंचे। वह ट्रंप को युद्ध में धकेलना चाहते थे। दोनों के बीच तीन घंटे तक चर्चा चली। इसके पांच दिन बाद ट्रंप पलट गए और सार्वजनिक रूप से कहा कि बातचीत सफल नहीं होगी। 17 फरवरी को हुई शांति वार्ता भी विफल हो गई।
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अगले दिन, ट्रंप ने सिचुएशन रूम में युद्ध की संभावनाओं पर बैठक की। उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने छोटे हमले के विचार को खारिज कर दिया। उनका मानना था कि युद्ध हो तो बड़ा हो और जल्द हो। ट्रंप को यह बात पसंद आई। चीफ ऑफ स्टाफ जनरल केन ने हमले के कई विकल्प बताए, साथ ही चेतावनी दी कि ईरान को हराना आसान नहीं होगा।
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ट्रंप के करीबी दोस्त टकर कार्लसन युद्ध के खिलाफ थे। उन्होंने फरवरी में तीन बार ट्रंप से मिलकर युद्ध न करने को कहा। कार्लसन ने तर्क दिया कि यह सिर्फ इज़राइल का हित है। ट्रंप ने कहा कि उन्हें युद्ध के परिणाम पता हैं, लेकिन इज़राइल का साथ देने के अलावा कोई रास्ता नहीं है।
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चार दिन बाद, विदेश मंत्री मार्को रूबियो और जॉन रैटक्लिफ ने 'गैंग ऑफ 8' के नाम से जाने जाने वाले कांग्रेस सदस्यों से बात की। उन्होंने युद्ध का विकल्प सामने रखा। कुछ डेमोक्रेट्स ने आलोचना की कि ट्रंप नेतान्याहू को अमेरिकी विदेश नीति तय करने दे रहे हैं।
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इसके दो दिन बाद, 26 फरवरी को जिनेवा में फिर से परमाणु वार्ता हुई। अमेरिका अपने पुराने रुख पर अड़ा रहा और ईरान भी नहीं झुका। बातचीत खत्म हो गई। प्रतिनिधियों ने ट्रंप को सूचित किया कि परमाणु समझौते पर पहुंचना संभव नहीं है।
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संकेत हैं कि यह सारी कूटनीतिक कोशिशें सिर्फ एक नाटक थीं। बातचीत से एक दिन पहले ही अमेरिका और इज़राइल एक फैसले पर पहुंच चुके थे। योजना थी कि बातचीत विफल होने पर उसी रात हमला किया जाएगा। हालांकि, बाद में इसे अगले दिन, यानी शुक्रवार की रात के लिए टाल दिया गया।
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तभी CIA ने एक अहम जानकारी दी। शनिवार सुबह खामेनेई मध्य तेहरान में अपने आधिकारिक आवास पर होंगे। पास की एक इमारत में ईरान के वरिष्ठ नेताओं की बैठक होगी। CIA ने यह जानकारी इज़राइल को दी। इसके साथ ही हमले की तारीख और समय बदलकर शनिवार सुबह कर दिया गया।
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शुक्रवार को टेक्सास जाने से ठीक पहले, ट्रंप ने नेतन्याहू से बात की। नेतन्याहू ने बताया कि वे तैयार हैं। कुछ घंटों बाद, ट्रंप ने सैन्य कमांडरों के साथ अंतिम चर्चा की और 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' को मंजूरी दे दी। उन्होंने कहा, 'अब पीछे नहीं हटना है। शुभकामनाएं।'
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ईरान में शनिवार को काम शुरू होता है। उस सुबह 9:45 बजे, जब लोग काम पर जा रहे थे, यह हमला हुआ। सुबह छह बजे इज़राइली बेस से उड़े विमान मध्य तेहरान में उस महत्वपूर्ण इमारत के ऊपर पहुंच चुके थे।
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उन इमारतों में से एक में सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल की बैठक शुरू हुई। खामेनेई बगल की इमारत में थे। उन्होंने बैठक के तुरंत बाद जानकारी देने के लिए कहा था। लेकिन इसकी नौबत ही नहीं आई। इज़राइली विमानों से दागी गईं सटीक मिसाइलों ने हमेशा के लिए सब कुछ खत्म कर दिया।
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