ईरान ने डिएगो गार्सिया स्थित अमेरिका-ब्रिटेन बेस पर मिसाइल दागकर अपनी लंबी दूरी की क्षमता का संकेत दिया। भले हमला सफल नहीं रहा, लेकिन इससे साफ है कि ईरान 2000 किमी सीमा से काफी आगे बढ़ चुका है और नई रणनीति अपना रहा है।

Iran-US War Latest Updates: ईरान के साथ अमेरिका-इजरायल के बीच चल रहा तनाव अब पहली बार मिडिल-ईस्ट से बाहर हिंद महासागर क्षेत्र तक पहुंच गया है। बीते शनिवार को ईरान की IRGC एयरोस्पेस फोर्स ने डिएगो गार्सिया में स्थित अमेरिका और ब्रिटेन के संयुक्त मिलिट्री बेस को निशाना बनाकर मिसाइलें दागीं। यह बेस भारत से काफी दक्षिण में हिंद महासागर में स्थित है और ईरान के तट से लगभग 4000 किलोमीटर दूर है। ईरान की मिसाइलें भले ही सटीक तरीके से अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकीं, लेकिन इस घटना ने ईरान की मध्यम दूरी से लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल क्षमता को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। खास बात यह है कि ये मिसाइलें भारत के आसपास के क्षेत्र से गुजरी होंगी।

क्या 2000 किमी की सीमा से आगे बढ़ा ईरान?

अब तक ईरान सार्वजनिक रूप से अपनी मिसाइलों की अधिकतम रेंज 2000 किलोमीटर बताता रहा है। लेकिन इस हमले से संकेत मिलता है कि उसने इस सीमा को पार कर लिया है। बीते साल जून में 12 दिन चले संघर्ष के बाद ईरानी सूत्रों ने संकेत दिए थे कि मिसाइल रेंज पर खुद लगाई गई पाबंदी हटाई जा सकती है। हालांकि, इस पाबंदी की आधिकारिक पुष्टि कभी नहीं हुई थी। इजरायल पहले भी ईरान पर अपनी मिसाइल क्षमता को छिपाने का आरोप लगाता रहा है।

ईरान की मिसाइल क्षमता पर एक्सपर्ट की राय

अमेरिका में रहने वाले मिसाइल एक्सपर्ट अंकित पांडा के मुताबिक, जो लोग ईरान के अंतरिक्ष और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रमों पर नजर रखते हैं, उनके लिए यह घटना ज्यादा चौंकाने वाली नहीं है। उनके मुताबिक, ईरान के पास लंबी दूरी की मिसाइल डेवलप करने की तकनीकी क्षमता पहले से मौजूद है। ईरान विभिन्न प्रकार के बूस्टर और प्रोपेलेंट सिस्टम बनाने में सक्षम है। मिसाइल की रेंज कई कारकों पर निर्भर करती है, जैसे पेलोड का वजन। पेलोड कम करके मिसाइल की दूरी को आसानी से बढ़ाया जा सकता है।

स्पेस लॉन्च व्हीकल (SLV) से बनी हो सकती है मिसाइल

पांडा का मानना है कि इस हमले में इस्तेमाल की गई मिसाइल संभवतः एक संशोधित स्पेस लॉन्च व्हीकल (SLV) हो सकती है। इजरायल डिफेंस फोर्सेज के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल एयाल जमीर ने भी कहा कि इस हमले में दो-स्टेज बैलिस्टिक मिसाइल का इस्तेमाल हुआ। हालांकि, लॉन्च सिस्टम की पूरी जानकारी सामने नहीं आई है, लेकिन संभावना है कि यह ईरान के Ghaem-100 या Ghaem-105 जैसे तीन-स्टेज स्पेस लॉन्च व्हीकल पर बेस्ड हो सकता है।

लंबी दूरी के बावजूद सीमित सैन्य खतरा

भले ही ईरान की मिसाइल लंबी दूरी तय कर सकती हो, लेकिन एक्सपर्ट इसे बड़े पैमाने पर सैन्य खतरा नहीं मानते। पांडा के अनुसार, ऐसी मिसाइलें जो पहले कभी परीक्षण में पूरी तरह सफल नहीं रही हों, उनसे बहुत ज्यादा सैन्य नुकसान पहुंचाना मुश्किल होता है। डिएगो गार्सिया पर हमले का मुख्य उद्देश्य सैन्य नुकसान से ज्यादा एक रणनीतिक संदेश देना था कि युद्ध को मिडिल ईस्ट से बाहर भी फैलाया जा सकता है।

क्या उत्तर कोरिया से मिला तकनीकी सहयोग?

इस पूरे मामले में उत्तर कोरिया की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पांडा ने इसे केवल एक संभावना बताया है। उन्होंने 2017 में उत्तर कोरिया के इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) परीक्षण का उदाहरण दिया, जिसमें ऊपरी चरण में बदलाव देखे गए थे। उनका मानना है कि उस डिजाइन में ईरान के Safir SLV की झलक दिखती थी। इससे यह संभावना बनती है कि दोनों देशों के बीच तकनीकी सहयोग हुआ हो। हालांकि, यह अभी तक साबित नहीं हुआ है, लेकिन ईरान और उत्तर कोरिया के बीच मिसाइल सहयोग को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है।