सार

बच्चों के मानसिक विकास पर माता-पिता के शब्दों का गहरा असर होता है। गुस्से में कही गई नकारात्मक बातें बच्चों के आत्मविश्वास को तोड़ सकती हैं और उन्हें जीवन भर याद रहती हैं।

बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास पर उनके माता-पिता या परिवार के सदस्यों द्वारा कहे गए शब्दों का गहरा प्रभाव पड़ता है। जब बच्चे किसी मुश्किल दौर से गुजर रहे होते हैं, तो उनकी कमजोरी को समझते हुए उनसे नकारात्मक या गुस्से में कही गई बातें उन्हें जीवन भर याद रहती हैं। इन शब्दों का उनके आत्मविश्वास, मानसिक स्थिति और भावनाओं पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। आइए जानते हैं कुछ खतरनाक बातें जो गुस्से में बच्चों से न कहें:

5 बातें जो गुस्से में बच्चों से न कहें

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1. ये मेरी मेहनत के कारण तुमने जीता है

  • इस तरह के शब्द बच्चे पर दबाव डालते हैं और उसे यह महसूस कराते हैं कि उसकी अपनी मेहनत या सफलता का कोई महत्व नहीं है। इससे बच्चे में आत्म-संवेदनशीलता और आत्मविश्वास की कमी हो सकती है।
  • बच्चा अपनी मेहनत को महत्व नहीं देगा और हर सफलता को अपने माता-पिता के योगदान से जोड़ेगा, जिससे उसका मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है।

2. मैंने तुम्हारे लिए सब कुछ किया है और तुम मुझे ऐसे जवाब दे रहे हो

  • यह एक बहुत ही नकारात्मक और निराशाजनक विचार है। इसे बच्चे को यह अहसास हो सकता है कि उसकी मेहनत या उपलब्धियां कभी भी सराहनीय नहीं होती हैं।
  • बच्चा आत्मग्लानि महसूस करेगा और उसे लगेगा कि वह कभी भी अपने माता-पिता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सकता।

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3.काश तुम कभी पैदा नहीं होते, तुम बेकार हो

  • यह बहुत ही खतरनाक और हानिकारक शब्द हैं। इससे बच्चे की आत्म-छवि और मानसिक स्थिति पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह बच्चे के आत्मसम्मान को तोड़ सकता है और उसे भावनात्मक रूप से कमजोर बना सकता है।
  • बच्चा खुद को हीन समझने लगेगा और यह उसकी मानसिक स्थिति को और भी कमजोर कर सकता है, जो कि उसके जीवन भर के आत्मविश्वास को प्रभावित करेगा।

4. मैं तुम्हारी पढ़ाई पर बहुत पैसा खर्च कर रहा हूं, मुझे परिणाम चाहिए

  • इस तरह की बातें बच्चों पर दबाव डालती हैं और उसे यह समझाती हैं कि शिक्षा सिर्फ परिणामों के लिए है, न कि ज्ञान और विकास के लिए।
  • बच्चा परीक्षा या स्कूल के परिणामों को लेकर तनाव महसूस करेगा, जो उसकी मानसिक स्थिति को नकारात्मक तरीके से प्रभावित कर सकता है।

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5. मैंने अपने सपनों को तुम्हारे लिए बलिदान कर दिया है, अब तुम्हारे लिए यह समय है कि तुम उन्हें सच करो

इस तरह की बातें बच्चों पर यह दबाव डालती हैं कि उन्हें अपने माता-पिता के सपनों को जीना चाहिए, न कि अपनी खुद की इच्छाओं और आकांक्षाओं को।

बच्चा अपनी पहचान और सपनों को छोड़कर हमेशा अपने माता-पिता की इच्छाओं को पूरा करने में लगा रहेगा, जिससे उसकी खुशी और आत्म-संवेदनशीलता प्रभावित हो सकती है।