त्रिशूर की नई कलेक्टर ने पदभार ग्रहण कर अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता को दिया। एक भावुक नोट में उन्होंने दिवंगत पिता की प्रेरणा और माँ के संघर्ष को याद किया, जिन्होंने 20 साल मेहनत कर और लोन लेकर उन्हें पढ़ाया।

त्रिशूर: जब कोई अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी कामयाबी हासिल करता है, तो उसे वे लोग सबसे ज़्यादा याद आते हैं जिन्होंने इस सफ़र में उसका साथ दिया. कुछ ऐसी ही कहानी है त्रिशूर की नई डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर शिखा सुरेंद्रन की, जिन्होंने पद संभालते ही अपने माता-पिता को याद करते हुए एक बेहद भावुक नोट लिखा, जो अब लोगों का दिल छू रहा है. उन्होंने लिखा कि आज जब वो कलेक्टर बन गई हैं, तो इस पल को देखने के लिए उनके पिता साथ नहीं हैं, जिसकी उन्हें बहुत कमी महसूस हो रही है. कलेक्टर ने याद किया कि डायलिसिस बेड पर रहते हुए भी उनके पिता ने जो हिम्मत दी, वही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी.

उन्होंने बताया कि पिता के बीमार पड़ने के बाद, पिछले 20 सालों से उनकी मां ने ही पूरे घर को संभाला और उनके लिए पसीना बहाया. मां एक कंपनी में घंटों खड़े रहकर काम करती थीं और जब थक-हारकर घर लौटती थीं, तो उन्हें पढ़ाई में मदद करने का तरीका नहीं पता होता था. इसके बावजूद, उन्होंने बेटी के सपनों को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. बेटी को सिविल सर्विस की कोचिंग करानी थी, तो मां ने केरल की महिला स्वयं-सहायता समूह 'कुटुंबश्री' और एक सहकारी बैंक से लोन लिया. जब घर के आर्थिक हालात देखकर कलेक्टर ने पढ़ाई के साथ नौकरी करने का सोचा, तो माता-पिता ने ही उन्हें रोक दिया और सिर्फ़ पढ़ाई पर ध्यान देने को कहा.

कलेक्टर ने लिखा कि जब वो चार्ज लेने के लिए घर से निकल रही थीं और मां के पैर छुए, तो मां रो पड़ीं. उनकी आंखों में पिता की कमी का दर्द साफ था. सरकारी गाड़ी में बैठते वक्त भी मां दुख के कारण चुप ही रहीं. उन्होंने अपनी पोस्ट का अंत इन शब्दों से किया, "सिविल सर्विस की इस कुर्सी तक मुझे सिर्फ़ पढ़ी हुई किताबों ने नहीं पहुंचाया, बल्कि एक मां और एक पिता के उस अटूट विश्वास ने पहुंचाया है, जिन्हें यकीन था कि उनकी बेटी यह करके दिखाएगी."

कलेक्टर का दिल छू लेने वाला पूरा नोट...

सपने देखना मुझे मेरे पिता ने सिखाया. आज जब मैंने त्रिशूर डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर का चार्ज लिया, तो मैं बहुत चाहती थी कि काश इस पल को देखने के लिए मेरे पिता भी यहां होते. डायलिसिस बेड से उन्होंने मुझे जितनी हिम्मत और आत्मविश्वास दिया, उतना शायद ही कोई और दे पाया हो. मैं यह नोट नम आंखों से लिख रही हूं, लेकिन मुझे यकीन है कि उनका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ रहेगा और यही मेरी आगे की ताकत है. जब मैं चार्ज लेने के लिए कलेक्टर ऑफिस जा रही थी, तो मैंने मां के पैर छुए. वो रो पड़ीं, क्योंकि उन्हें पापा की कमी महसूस हो रही थी. मेरे साथ डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर की कार में बैठने के बाद भी वो दुख के कारण चुप रहीं. जब पापा बीमार पड़े, तो लगभग बीस साल तक मां ने हमारे लिए मेहनत की. वो कंपनी में घंटों खड़े होकर काम करती थीं. थकी-हारी घर लौटने पर उन्हें मुझे सलाह देना या पढ़ाई में मदद करना नहीं आता था. सिविल सर्विस की कोचिंग के लिए उन्होंने 'कुटुंबश्री' और सहकारी बैंक से लोन लिया. जब मैंने घर की हालत देखकर नौकरी के साथ पढ़ाई करने का सोचा, तो मां और पापा ने ही मुझे मना कर दिया.

सिविल सर्विस परीक्षा के आंसर शीट से लेकर डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर की कुर्सी तक का मेरा सफ़र सिर्फ़ किताबों की वजह से पूरा नहीं हुआ; बल्कि यह एक मां और एक पिता के विश्वास की वजह से हुआ, जिन्हें तब भी मुझ पर यकीन था जब मैं थक जाती थी, काम टाल देती थी, या हारने से डरती थी. उन्हें हमेशा विश्वास था कि उनकी बेटी यह कर दिखाएगी.